Sant Kabir Das Biography in Hindi | कबीरदास का जीवन परिचय और रचनाएँ

संत कबीरदास: एक समाज सुधारक और महान कवि

जीवन परिचय, दर्शन, रचनाएँ और हिंदी साहित्य में योगदान

भारत की पावन धरा ने समय-समय पर ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया है, जिन्होंने न केवल अध्यात्म की राह दिखाई, बल्कि समाज में व्याप्त कुरीतियों पर भी कड़ा प्रहार किया। भक्ति काल की निर्गुण धारा के ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि संत कबीरदास का नाम इनमें सर्वोपरि है। कबीर केवल एक कवि नहीं थे, वे एक समाज सुधारक, एक युग-दृष्टा और मानवता के सच्चे पुजारी थे। उनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 600 वर्ष पूर्व थी।

आइए, इस लेख में हम कबीरदास जी के जीवन, उनकी रचनाओं और उनके अनमोल साहित्यिक व सामाजिक योगदान का विस्तार से अध्ययन करते हैं।

संत कबीरदास - जुलाहा कार्य करते हुए चित्र: संत कबीरदास, भक्ति काल के महान समाज सुधारक और कवि (स्रोत: ROJGARJOSH.IN)

1. कबीरदास का जीवन परिचय (Jivan Parichay)

कबीरदास के जन्म और मृत्यु के संबंध में अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं। उनके जीवन के बारे में प्रामाणिक तथ्यों का अभाव है, फिर भी साहित्यकारों और इतिहासकारों ने जनश्रुतियों और उनकी रचनाओं के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे इस प्रकार हैं:

जन्म और बाल्यकाल

कबीरदास का जन्म सन् 1398 ई. (संवत् 1455) के आसपास काशी (वाराणसी) में माना जाता है। एक प्रसिद्ध दोहे के अनुसार:

"चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसायत को, पूरनमासी तिथि प्रगट भए॥"

कहा जाता है कि उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था, जिसने लोक-लाज के भय से नवजात शिशु को काशी के लहरतारा नामक तालाब के किनारे छोड़ दिया था। वहाँ से गुजर रहे नीरू और नीमा नामक निःसंतान जुलाहा (बुनकर) दंपती ने बालक को देखा और उसे अपना लिया। उन्होंने ही बालक का पालन-पोषण किया और उसका नाम 'कबीर' रखा, जिसका अर्थ अरबी भाषा में 'महान' होता है।

शिक्षा और गुरु दीक्षा

कबीरदास विधिवत साक्षर नहीं थे। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है – "मसि कागद छूयो नहिं, कलम गहि नहिं हाथ।" अर्थात, उन्होंने कभी कागज और स्याही को नहीं छुआ और न ही हाथ में कलम पकड़ी। उनका समस्त ज्ञान सत्संग, भ्रमण और आत्म-चिंतन पर आधारित था।

उस समय स्वामी रामानंद का बड़ा नाम था। कबीर उन्हें अपना गुरु बनाना चाहते थे, लेकिन सामाजिक बंधनों के कारण यह कठिन था। एक दिन कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए। ब्रह्म मुहूर्त में स्वामी रामानंद स्नान करने जा रहे थे, तभी उनका पैर कबीर पर पड़ा और उनके मुख से 'राम-राम' शब्द निकला। कबीर ने इसी को गुरु-मंत्र मान लिया और स्वामी रामानंद के शिष्य बन गए।

वैवाहिक जीवन और व्यवसाय

कबीर गृहस्थ संत थे। उनका विवाह 'लोई' नामक कन्या से हुआ। उनसे उन्हें एक पुत्र 'कमाल' और एक पुत्री 'कमाली' की प्राप्ति हुई। वे पैतृक व्यवसाय के रूप में कपड़ा बुनने का काम (जुलाहा) करते थे और इसी कमाई से अपना और अपने संतों का भरण-पोषण करते थे। वे कर्म से कभी विमुख नहीं हुए।

2. साहित्यिक रचनाएँ (Literary Works)

जैसा कि बताया गया, कबीर स्वयं पढ़े-लिखे नहीं थे। उनके शिष्यों (विशेषकर धर्मदास) ने उनकी वाणियों का संग्रह किया। कबीर की रचनाओं का सबसे प्रामाणिक संग्रह 'बीजक' (Bijak) है। इसके तीन मुख्य भाग हैं:

  • साखी (Sakhi): 'साखी' शब्द 'साक्षी' का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है गवाह। इसमें दोहों का संग्रह है। इनमें कबीर ने अपने अनुभवों और ज्ञान को साक्षी मानकर उपदेश दिए हैं। ये गेय मुक्तक हैं।
  • सबद (Sabad): ये गेय पद हैं। इनमें कबीर के प्रेम, साधना और भावावेश की अभिव्यक्ति हुई है। इनमें संगीतात्मकता की प्रधानता है।
  • रमैनी (Ramaini): यह चौपाई और दोहा छंद में रचित है। इसमें कबीर के दार्शनिक विचारों, ईश्वर संबंधी मान्यताओं और जगत के रहस्यों का वर्णन है।

इसके अतिरिक्त, 'कबीर ग्रंथावली' और सिखों के पवित्र ग्रंथ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में भी कबीर के कई पद संकलित हैं।

3. भाषा-शैली (Language Style)

कबीर की भाषा को विद्वानों ने अलग-अलग नाम दिए हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे 'सधुक्कड़ी' कहा है, जबकि श्यामसुंदर दास ने इसे 'पंचमेल खिचड़ी' कहा है।

चूंकि कबीर घुमक्कड़ थे और साधुओं की संगति में रहते थे, इसलिए उनकी वाणी में अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, पंजाबी, राजस्थानी, अरबी और फारसी के शब्द मिल जाते हैं। उनकी भाषा व्याकरण के नियमों में नहीं बंधी थी, बल्कि वह भावों को व्यक्त करने वाली 'हृदय की भाषा' थी। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तो उन्हें "वाणी का डिक्टेटर" तक कहा है, क्योंकि वे भाषा को अपनी मर्जी के मुताबिक इस्तेमाल करने में सक्षम थे।

4. कबीर का दर्शन और सामाजिक योगदान

कबीर का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक साथ भक्त, सुधारक और विद्रोही थे। उनका योगदान निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

1. निर्गुण ब्रह्म की उपासना

कबीर ने मूर्ति पूजा और अवतारवाद का खंडन किया। उनके राम, दशरथ पुत्र राम नहीं, बल्कि कण-कण में व्याप्त 'निर्गुण ब्रह्म' हैं। वे कहते हैं:

"दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना।"

2. बाह्य आडंबरों का विरोध

कबीर ने हिंदू और मुसलमान, दोनों धर्मों में व्याप्त कुरीतियों और पाखंडों पर जमकर प्रहार किया।

  • हिंदुओं के लिए: "पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजूँ पहार। ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार॥"
  • मुसलमानों के लिए: "काँकर पाथर जोरि के, मस्जिद लई बनाय। ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥"

3. जाति-पाति का खंडन

मध्यकालीन समाज में जाति-प्रथा चरम पर थी। कबीर ने इसका घोर विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने कुल से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से महान बनता है:

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥"

4. गुरु की महत्ता

कबीर ने ईश्वर से भी ऊँचा स्थान गुरु को दिया है। उनका मानना था कि गुरु ही वह माध्यम है जो जीव को ईश्वर तक पहुँचाता है:

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥"

5. हिंदू-मुस्लिम एकता

कबीर जीवन भर हिंदू और मुसलमानों के बीच की खाई को पाटने का प्रयास करते रहे। वे खुद को न तो पूर्णतः हिंदू मानते थे, न मुसलमान। वे मानवता के पक्षधर थे। उन्होंने दोनों को मिल-जुलकर रहने का संदेश दिया।

5. मृत्यु और मगहर की कथा

कबीर का पूरा जीवन काशी में बीता, लेकिन जीवन के अंतिम समय में वे मगहर चले गए। उस समय यह अंधविश्वास था कि काशी में मरने से स्वर्ग मिलता है और मगहर में मरने से नर्क। इस अंधविश्वास को तोड़ने के लिए कबीर ने मगहर में प्राण त्यागने का निर्णय लिया।

सन् 1518 ई. के आसपास उनकी मृत्यु हुई। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद हिंदू उनके शव को जलाना चाहते थे और मुसलमान दफनाना। जब चादर हटाई गई, तो वहाँ शव की जगह केवल फूल मिले। आधे फूल हिंदुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने। यह घटना सिद्ध करती है कि कबीर किसी एक धर्म के नहीं, बल्कि पूरी मानवता के थे।

निष्कर्ष (Conclusion)

कबीरदास हिंदी साहित्य के ऐसे सूर्य हैं, जिसका प्रकाश कभी मद्धम नहीं हो सकता। वे मध्यकाल के अंधकार में एक जलती हुई मशाल की तरह थे। उनकी वाणी में वह ओज और सत्यता है जो आज के वैज्ञानिक युग में भी प्रासंगिक है। वे पाखंड के विरोधी, सांप्रदायिक सौहार्द के अग्रदूत और मानवतावाद के सच्चे पोषक थे।

उनका साहित्य हमें सिखाता है कि ईश्वर मंदिरों या मस्जिदों में नहीं, बल्कि मनुष्य के हृदय में और उसकी सेवा में बसता है। कबीर आज भी हमारे बीच अपनी साखियों और पदों के माध्यम से जीवित हैं और हमें सही राह दिखा रहे हैं।

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